7:39 AM

मौत कब आएगी? शरीर खुद बताएगा...



संसार का सबसे बड़ा सच मौत है। जो पैदा हुआ है उसे एक न एक दिन मरना ही है। सभी मौत से डरते हैं। हर किसी की यह इच्छा होती है कि उसे उसकी भावी मौत की सूचना प्राप्त हो जाए। कई बार हमारे शरीर के अंग भी मौत की पूर्व सूचना दे देते हैं। हमारे शास्त्र भी इसका प्रमाण देते हैं।
1. यदि अचानक शरीर सब ओर से सफेद या पीला पड़ जाए और ऊपर से कुछ लाल दिखे तो उस मनुष्य की मौत छह महीने में ही हो जाती है।
2. जब आंखें सूर्य चंद्रमा या अग्रि का प्रकाश देखना बंद कर दें या उन्हें सब कुछ काला ही दिखे तो भी मनुष्य सिर्फ छह महीने ही जीवित रहता है।
3. जब शरीर के सभी अंगों में अंगड़ाई आने लगे या तालु सूख जाए तब मनुष्य एक महीने ही जीवित रहता है।
4. त्रिदोष में जिसकी नाक बहने लगे उसका जीवन पंद्रह दिन से अधिक नहीं रहता।
5. जब मनुष्य अपनी छाया को सिर रहित या अपने आपको ही छाया रहित पाए तो वह एक महीने भी जीवित नहीं रहता।
6. जिसकी जीभ फूल जाए या दांतों से मवाद निकलने लगे तो उसकी भी छह महीने के भीतर ही मौत हो जाती है।



मौत की भविष्यवाणी भी करते हैं सपनें


मौत ऐसी सच्चाई है जिसके बारे में सभी जानते हैं लेकिन फिर भी उससे अनभिज्ञ बने रहते हैं। भविष्य में घटने वाली शुभ-अशुभ घटनाओं के तरह सपने मौत की भविष्यवाणी भी करते हैं। आवश्यकता है उनका आशय समझने की। स्वप्न ज्योतिष में ऐसे स्वप्नों की जानकारी दी गई है।
1- जो व्यक्ति स्वप्न में स्वयं को शमशान अथवा पर्वत के शिखर पर बैठकर मदिरापान करता देखता है वह शीघ्र ही मृत्यु को प्राप्त होता है।
2- स्वप्न में जो स्वयं को स्याही अथवा तेल शरीर पर लगाकर गधे की सवारी करता देखता है, उसकी निश्चित रूप से मृत्यु हो जाती है।
3- जो व्यक्ति लगातार भयानक सपने देखता है, उसके प्राण एक वर्ष के भीतर यमराज हर कर ले जाते हैं।
4- यदि कोई स्त्री स्वप्न में स्वयं के सफेद बाल देखती है तो उसका पति से विछोह हो जाता है या उसके पति की मृत्यु हो जाती है।
5- यदि स्वप्न में आप स्वयं को यात्रा पर जाे हुए देंखे तो यात्रा टाल दें क्योंकि यात्रा में आपकी मृत्यु हो सकती है।
6- यदि सपने में शरीर का कोई अंग कटा हुआ देंखे तो निकट भविष्य में किसी परिजन की मृत्यु अवश्यासंभी है।
7- जो व्यक्ति स्वप्न में स्वयं को हंसता या नाचता हुआ देखता है उसकी हत्या हो जाती है।
8- जो व्यक्ति स्वप्न में कौआ देखता है उसे शीघ्र ही किसी की मृत्यु का समाचार मिलता है।
9- यदि कोई स्वयं को स्वप्न में काले कपड़े पहनकर, काले घोड़े पर सवार होकर देखता है तो किसी रोग के कारण शीघ्र ही उसकी मृत्यु हो जाती है।
10- जो व्यक्ति अपने इष्ट देवी की प्रतिमा को फूटते हुए या जलते हुए देखता है उसकी कुछ ही दिनों में मृत्यु हो जाती है।
11- यदि कोई लाल साड़ी पहनी हुई स्त्री स्वप्न में आलिंगन करे व सूखे फूलों की माला पहनाए तो उसकी मृत्यु शीघ्र ही हो जाती है।
12- जो व्यक्ति स्वप्न में स्त्री का स्तनपान करता है, उसकी मृत्यु निश्चित है।
13- यदि कोई लंबे नाखून, पीली आंख नाली निर्वस्त्र स्त्री स्वप्न में आलिंगन करे तो भी मृत्यु हो जाती है।
14- स्वप्न में यदि कोई स्वयं को पेड़ से गिरता हुआ देखता है तो रोग जनित होकर उसकी मृत्यु हो जाती है।
15- यदि कोई व्यक्ति स्वप्न में नगाड़े बते हुए स्वयं का मुंजाडन करवाता है तो शीघ्र ही उसके परिवार में किसी वृद्ध की मौत हो जाती है।



7:37 AM

क्या कुत्ते मौत को भांप लेते हैं?


हिंदू धर्म में कई शकुन-अपशकुन की मान्यताएं हैं। कुछ शकुन-अपशकुन जीव-जंतुओं से भी जुड़े हैं। ऐसा माना जाता है भविष्य में होने वाली घटनाओं के बारे में जीव-जंतुओं को पूर्व में पता चल जाता है। कुत्ता एक ऐसा प्राणी है जो मनुष्यों के सबसे निकट है। ऐसी जनश्रुति है कि कुत्तों को प्रेत, आत्मा तथा यमदूत दिखाई देते हैं। शकुन शास्त्र में कुत्ते को शकुन रत्न कहा गया है। कुत्ते से जुड़े कुछ शकुन-अपशकुन इस प्रकार हैं-
1- यदि कुत्ता किसी बीमार व्यक्ति के हाथ को चाटता है तो वह एक सप्ताह के भीतर मर जाता है। यदि कुत्ता रोगी के मुख व नाक को चाटे तो रोगी की दस दिन में मृत्यु हो जाती है। और यदि कुत्ता रोगी के पास आकर सो जाए और उसके मुंह से लार टपके तो रोगी की मृत्यु उसी दिन हो जाती है।
2- यात्रा पर निकलते समय किसी व्यक्ति को कुत्ता अपने मुख में रोटी, पुड़ी या अन्य कोई खाद्य वस्तु खाता दिखे तो उसे धन का लाभ होता है।
3- जिस कुत्ते की पुंछ या कान कटे हो। अगर ऐसा कुत्ता किसी यात्री के समाने आ जाए तो कार्य में असफलता मिलती है।
4- यदि कुत्ता किसी के घर में बार-बार दीवार कुरेदता है तो उस घर में निश्चित रूप से चोरी होती है।
5- यात्रा पर निकलते समय यदि कुत्ता पीछे से आकर रोता है तो यात्री की मृत्यु हो सकती है।
6- यदि कुत्ता आकर किसी के पैरों को सूंघता है तो उसे शीघ्र ही यात्रा पर जाना पड़ता है।
7- कुत्ता यदि अपनी जीभ से अपने दाहिने अंग को चाटता है या खुजाता है तो ये कार्य सिद्धि की सूचना है।
8- यात्रा पर निकलते समय यदि कुत्ता जूते लेकर भाग जाए या किसी के जूते लेकर आगे आ जाए तो निश्चित रूप से धन हानि होती है।
9- किसी रोगी के समीप कुत्ता आकर अपनी पूंछ बार-बार चाटे या सूंघे तो रोगी की दो-तीन दिन में मृत्यु हो जाती है।
10- यदि कोई कुत्ता जाते हुए व्यक्ति के साथ बाईं ओर चलता है तो उसे सुंदर स्त्री व धन मिलता है। यदि दाहिनी ओर चले तो चोरी से धन हानि की सूचना देता है।

5:04 AM

Zardozi in India


Zardozi embroidery is beautiful metal embroidery, which once used to embellish the attire of the Kings and the royals in India. It was also used to adorn walls of the royal tents, scabbards, wall hangings and the paraphernalia of regal elephants and horses. Zardozi embroidery work involves making elaborate designs, using gold and silver threads. Further adding to the magnificence of the work are the studded pearls and precious stones.


Zardosi embroidery has been in existence in India from the time of the Rig Veda. There are numerous instances mentioning the use of zari embroidery as ornamentation on the attire of gods. Initially, the embroidery was done with  pure silver wires and real gold leaves. However, today, craftsmen make use of a combination of copper wire, with a golden or silver polish, and a silk thread. This is because there is hardly any availability of gold/silver on  such a large scale as before.


Main Center of Zardozi Embroidery in India 


Zardosi embroidery work is mainly a specialty of Lucknow, Bhopal, Hyderabad,Delhi, Agra, Kashmir, Mumbai, Ajmer and Chennai. 


History of Zardozi Embroidery in India 


The word 'Zardozi' is made up of two Persian terms, Zar meaning gold and Dozi meaning embroidery. A Persian embroidery form, Zardosi attained its summit in the 17th century, under the patronage of Mughal Emperor Akbar.Under the rule of Aurangzeb, the royal patronage stopped and this led to the decline of the craft. Since the cost was high and raw materials quite rare,craftsmen could not carry on with the embroidery on their own.  


Many craftsmen left Delhi and went to the courts of Rajasthan and Punjab in search of work. With the 18th and 19th century bringing industrialization, the craft suffered another setback.It was only after receiving independencein the year 1947 that the Indian government undertook steps to promote Zari embroidery.


Method of Zardozi Embroidery
The process of doing Zardozi embroidery starts with the craftsmen sitting cross-legged around the Addaa, the wooden framework, with their tools. The tools include curved hooks, needles, salmaa pieces (gold wires), sitaaras (metal stars), round-sequins, glass & plastic beads, dabkaa (thread) and kasab (thread). The second step in the process is to trace out the design on the cloth, if possible fabrics like silk, satin, velvet, etc. The fabric is then stretched over the wooden frame and the embroidery work begins. Needle is used to pull out each zardozi  element and then, it is integrated into the  basic design by pushing the needle into the fabric.

Zardosi

6:23 AM

संगती

एक वृक्ष पर दो तोते रहते थे| दोनों सगे भाई थे|एब बार बहुत ज़ोर कि आंधी आई और दोनों को उड़ाकर ले गई| एक चोरो की बस्ती में जाकर गिरा,और दूसरा ऋषियों के आश्रम में| दोनों अपनी जगह पर पलने लगे | धीरे-धीरे अनेक वर्ष बीत गए| एक दिन वहां का राजा आखेट के लिए निकला| आखेट करने के बाद वह विश्राम के लिए एक सरोवर के किनारे रुक गया| उसे नींद आ रही थी,किन्तु किसी तोते की कर्कश वाणी से नींद टूट गई| तोता कह रहा था-अरे कोई है? इस आदमी के पास बहुत सारा धन है| इसका गला दबाकर इसे मार डालो और सब कुछ लुट लो| यह सुनते ही राजा तुरंत वहां से निकल पड़ा|राजा रथ को तेज़ गति से दौड़ाता हुआ ऋषियों के आश्रम में पहुंचा | वहां कोई नही था| राजा इधर-उधर देख ही रहा था कि किसी तोते कि मधुरवाणी सुनाई दी-आइए राजन,ऋषि-मुनि भिक्षाटन  हेतु गए है| आश्रम में शीतल जल व फल मौजूद है| आप उनका सेवन कर अपनी थकान मिटाए| राजा ने चकित हो उससे कहा-तुम्हारे ही जैसा एक तोता कुछ देर पहले मुझे मारकर लूटने कि बात कह रहा था और तुम प्रेमपूर्ण वार्तालाप कर रहे हो| तुम दोनों में कितना फर्क है| तोते ने कहा-राजन, वह तोता मेरा भाई है| चोरो कि संगत में रहने के कारण वह सदैव हत्या और लूटपाट कि बात करता है और मैंने ऋषियों के साथ रहकर प्रेम व सदाचार सीखा है|
कहानी का मर्म यह है कि संगती का प्रभाव अनिवार्य रूप से व्यक्तित्व पर पड़ता है| हमे सुसंगति सदाचरण कि ओर तथा कुसंगति  दुराचरण कि ओर ले जाती है| मनुष्य को अच्छी संगत में रहना चाहिए|


Stories

10:42 PM

संतुलन में छिपी विकास कि राह
शरीर और मस्तिष्क के मिलकर काम करने से उर्जा का स्वभाविक रूप से नवीनीकरण होता है|
शरीर को इस तरह से बनाया गया है कि यह आश्चर्यजनक रूप से लंबे समय तक उर्जा का उत्पादन कर सके| अगर कोई व्यक्ति अपने शरीर का समुचित ध्यान रखे यानी खान-पान, व्यायाम, नींद,शरीरिक व्यसनों से मुक्ति इत्यादि पर ध्यान दे तो शरीर अपने आपको अच्छी तरह से स्वस्थ रख सकता है| अगर आदमी आनुवंशिक या स्वयं द्वारा प्रदत नकारात्मक भावात्मक प्रतिक्रिया द्वारा
अपनी उर्जा का क्षय होने देता है तो उसके पास जीवंत शक्ति कि कमी होगी| जब शरीर, मस्तिष्क और आत्मा मिलकर काम करते हैं तो व्यक्ति कि स्वभाविक अवस्था उर्जा के लगातार नवीनीकरण कि होती हैं|


दुनियां के महानतम आविष्कारक थामस अल्वा एडिसन के बारे में कहा जाता है कि जब वे कई घंटों कि मेहनत के बाद अपनी प्रयोगशाला से घर आते थे तो अपने बिस्तर पर लेट जाते थे|


तत्काल वे किसी बच्चे कि तरह स्वभाविक रूप से गहरी और बाधारहित नींद में सो जाते थे| चार या कई बार पांच घंटों के बाद जब वे जागते थे तो वे पूरी तरह तरोताज़ा होते थे और अपने काम पर लौटने को उत्सुक रहते थे|


एडिसन कि पत्नी ने एक बार कहा था कि वे पूरी तरह से प्रकृति और ईशवर के सामंजस्य में जीते थे| उनमे  कोई  असंतुलन नही था, कोई संघर्ष नही था, कोई भावात्मक अस्थिरता नही थी,कोई मानसिक गड़बडी नही थी| वे तब तक काम करते थे, जब तक उन्हें नींद कि जरुरत महसूस नही होती थी, फिर वे गहरी नींद में सो जाते थे और जब वे उठते थे तो फिर से अपने काम में जुट जाते थे| भावात्मक संतुलन और पूरी तरह विश्राम करने की उनकी योग्यता से उन्हें उर्जा प्राप्त होती थी| ब्रहामंडके साथ उनके अदभुत सामंजस्यपूर्ण सम्बन्ध के कारण प्रकृति ने उनके सामने अपने गोपनीय रहस्य खोल दिए|
सफलता के तरीके

1:07 AM

वैराग्य 
मुँशी शालिग्राम बनारस के पुराने रईस थे। जीवन-वृति वकालत थी और पैतृक सम्पत्ति भीअधिक थी। दशाश्वमेध घाट पर उनका वैभवान्वित गृह आकाश को स्पर्श करता था। उदार ऐसे कि पचीस-तीस हजार की वाषिर्क आय भी व्यय को पूरी न होती थी। साधु-ब्राहमणों के बड़े श्रद्वावान थे। वे जो कुछ कमाते, वह स्वयं ब्रह्रमभोज और साधुओं के भंडारे एवं सत्यकार्य में व्यय हो जाता। नगर में कोई साधु-महात्मा आ जाये, वह मुंशी जी का अतिथि।संस्कृत के ऐसे विद्वान कि बड़े-बड़े पंडित उनका लोहा मानते थे वेदान्तीय सिद्वान्तों के वे अनुयायी थे। उनके चित्त की प्रवृति वैराग्य की ओर थी।


मुंशीजी को स्वभावत: बच्चों से बहुत प्रेम था। मुहल्ले-भर के बच्चे उनके प्रेम-वारि से अभिसिंचित होते रहते थे। जब वे घर से निकलते थे तब बालाकों का एक दल उसके साथ होता था। एक दिन कोई पाषाण-हृदय माता अपने बच्वे को मार थी। लड़का बिलख-बिलखकर रो रहा था। मुंशी जी से न रहा गया। दौड़े, बच्चे को गोद में उठा लिया और स्त्री के सम्मुख अपना सिर झुक दिया। स्त्री ने उस दिन से अपने लड़के को न मारने की शपथ खा ली जो मनुष्य दूसरो के बालकों का ऐसा स्नेही हो, वह अपने बालक को कितना प्यार करेगा,सो अनुमान से बाहर है। जब से पुत्र पैदा हुआ, मुंशी जी संसार के सब कार्यो से अलग हो गये। कहीं वे लड़के को हिंडोल में झुला रहे हैं और प्रसन्न हो रहे हैं। कहीं वे उसे एक सुन्दर सैरगाड़ी में बैठाकर स्वयं खींच रहे हैं। एक क्षण के लिए भी उसे अपने पास से दूर नहीं करते थे। वे बच्चे के स्नेह में अपने को भूल गये थे।


सुवामा ने लड़के का नाम प्रतापचन्द्र रखा था। जैसा नाम था वैसे ही उसमें गुण भी थे। वह अत्यन्त प्रतिभाशाली और रुपवान था। जब वह बातें करता, सुनने वाले मुग्ध हो जाते। भव्य ललाट दमक-दमक करता था। अंग ऐसे पुष्ट कि द्विगुण डीलवाले लड़कों को भी वह कुछ न समझता था। इस अल्प आयु ही में उसका मुख-मण्डल ऐसा दिव्य और ज्ञानमय था कि यदि वह अचानक किसी अपरिचित मनुष्य के सामने आकर खड़ा हो जाता तो वह विस्मय से ताकने लगता था।


इस प्रकार हंसते-खेलते छ: वर्ष व्यतीत हो गये। आनंद के दिन पवन की भांति सन्न-से निकल जाते हैं और पता भी नहीं चलता। वे दुर्भाग्य के दिन और विपत्ति की रातें हैं, जो काटे नहीं कटतीं। प्रताप को पैदा हुए अभी कितने दिन हुए। बधाई की मनोहारिणी ध्वनि कानों मे गूंज रही थी छठी वर्षगांठ आ पहुंची। छठे वर्ष का अंत दुर्दिनों का गणेश था। मुंशी शालिग्राम का सांसारिक सम्बन्ध केवल दिखावटी था। वह निष्काम और निस्सम्बद्व जीवन व्यतीत करते थे। यद्यपि प्रकट वह सामान्य संसारी मनुष्यों की भांति संसार के क्लेशों से क्लेशित और सुखों से हर्षित दृष्टिगोचर होते थे, तथापि उनका मन सर्वथा उस महान और आनन्दपूर्व शांति का सुख-भोग करता था, जिस पर दु:ख के झोंकों और सुख की थपकियों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।


माघ का महीना था। प्रयाग में कुम्भ का मेला लगा हुआ था। रेलगाड़ियों में यात्री रुई की भांति भर-भरकर प्रयाग पहुंचाये जाते थे। अस्सी-अस्सी बरस के वृद्व-जिनके लिए वर्षो से उठना कठिन हो रहा था- लंगड़ाते, लाठियां टेकते मंजिल तै करके प्रयागराज को जा रहे थे। बड़े-बड़े साधु-महात्मा, जिनके दर्शनो की इच्छा लोगों को हिमालय की अंधेरी गुफाओं में खींच ले जाती थी, उस समय गंगाजी की पवित्र तरंगों से गले मिलने के लिए आये हुए थे। मुंशी शालिग्राम का भी मन ललचाया। सुवाम से बोले- कल स्नान है।


सुवामा - सारा मुहल्ला सूना हो गया। कोई मनुष्य नहीं दीखता।


मुंशी - तुम चलना स्वीकार नहीं करती, नहीं तो बड़ा आनंद होता। ऐसा मेला तुमने कभीनहीं देखा होगा।


सुवामा - ऐसे मेला से मेरा जी घबराता है।


मुंशी - मेरा जी तो नहीं मानता। जब से सुना कि स्वामी परमानन्द जी आये हैं तब से उनके दर्शन के लिए चित्त उद्विग्न हो रहा है।


सुवामा पहले तो उनके जाने पर सहमत न हुई, पर जब देखा कि यह रोके न रुकेंगे, तब विवश होकर मान गयी। उसी दिन मुंशी जी ग्यारह बजे रात को प्रयागराज चले गये। चलते समय उन्होंने प्रताप के मुख का चुम्बन किया और स्त्री को प्रेम से गले लगा लिया। सुवामा ने उस समय देखा कि उनके नेञ सजल हैं। उसका कलेजा धक से हो गया। जैसे चैत्र मास में काली घटाओं को देखकर कृषक का हृदय कॉंपने लगता है, उसी भाती मुंशीजी ने नेत्रों का अश्रुपूर्ण देखकर सुवामा कम्पित हुई। अश्रु की वे बूंदें वैराग्य और त्याग का अगाघ समुद्र थीं। देखने में वे जैसे नन्हे जल के कण थीं, पर थीं वे कितनी गंभीर और विस्तीर्ण।


उधर मुंशी जी घर के बाहर निकले और इधर सुवामा ने एक ठंडी श्वास ली। किसी ने उसके हृदय में यह कहा कि अब तुझे अपने पति के दर्शन न होंगे। एक दिन बीता, दो दिन बीते, चौथा दिन आया और रात हो गयी, यहा तक कि पूरा सप्ताह बीत गया, पर मुंशी जी न आये। तब तो सुवामा को आकुलता होने लगी। तार दिये, आदमी दौड़ाये, पर कुछ पता न चला। दूसरा सप्ताह भी इसी प्रयत्न में समाप्त हो गया। मुंशी जी के लौटने की जो कुछ  आशा शेष थी,वह सब मिट्टी में मिल गयी। मुंशी जी का अदृश्य होना उनके कुटुम्ब मात्र के लिए ही नहीं, वरन सारे नगर के लिए एक शोकपूर्ण घटना थी। हाटों में दुकानों पर, हथाइयो में अर्थात चारों और यही वार्तालाप होता था। जो सुनता, वही शोक करता- क्या धनी, क्या निर्धन। यह शौक सबको था। उसके कारण चारों और उत्साह फैला रहता था। अब एक उदासी छा गयी। जिन गलियों से वे बालकों का झुण्ड लेकर निकलते थे, वहां अब धूल उड़ रही थी। बच्चे बराबर उनके पास आने के लिए रोते और हठ करते थे। उन बेचारों को यह सुध कहां थी कि अब प्रमोद सभा भंग हो गयी है। उनकी माताएं ऑंचल से मुख ढांप-ढांपकर रोतीं मानों उनका सगा प्रेमी मर गया है।


वैसे तो मुंशी जी के गुप्त हो जाने का रोना सभी रोते थे। परन्तु सब से गाढ़े आंसू, उन आढतियों और महाजनों के नेत्रों से गिरते थे, जिनके लेने-देने का लेखा अभी नहीं हुआ था। उन्होंने दस-बारह दिन जैसे-जैसे करके काटे, पश्चात एक-एक करके लेखा के पत्र दिखाने लगे। किसी ब्रहृनभोज मे सौ रुपये का घी आया है और मूल्य नहीं दिया गया। कही से दो-सौ का मैदा आया हुआ है। बजाज का सहस्रों का लेखा है। मन्दिर बनवाते समय एक महाजन के बीस सहस्र ऋण लिया था, वह अभी वैसे ही पड़ा हुआ है लेखा की तो यह दशा थी। सामग्री की यह दशा कि एक उत्तम गृह और तत्सम्बन्धिनी सामग्रियों के अतिरिक्त कोई वस्त न थी, जिससे कोई बड़ी रकम खड़ी हो सके। भू-सम्पत्ति बेचने के अतिरिक्त अन्य कोई उपाय न था, जिससे धन प्राप्त करके ऋण चुकाया जाए।


बेचारी सुवामा सिर नीचा किए हुए चटाई पर बैठी थी और प्रतापचन्द्र अपने लकड़ी के घोड़े पर सवार आंगन में टख-टख कर रहा था कि पण्डित मोटेराम शास्त्री - जो कुल के पुरोहित थे - मुस्कराते हुए भीतर आये। उन्हें प्रसन्न देखकर निराश सुवामा चौंककर उठ बैठी कि शायद यह कोई शुभ समाचार लाये हैं। उनके लिए आसन बिछा दिया और आशा-भरी दृष्टि से देखने लगी। पण्डितजी आसान पर बैठे और सुंघनी सूंघते हुए बोले तुमने महाजनों का लेखा देखा?


सुवामा ने निराशापूर्ण शब्दों में कहा-हां, देखा तो।


मोटेराम-रकम बड़ी गहरी है। मुंशीजी ने आगा-पीछा कुछ न सोचा, अपने यहां कुछ हिसाब-किताब न रखा।


सुवामा-हां अब तो यह रकम गहरी है, नहीं तो इतने रुपये क्या, एक-एक भोज में उठ गये हैं।


मोटेराम-सब दिन समान नहीं बीतते।


सुवामा-अब तो जो ईश्वर करेगा सो होगा, क्या कर सकती हूं।


मोटेराम- हां ईश्वर की इच्छा तो मूल ही है, मगर तुमने भी कुछ सोचा है ?


सुवामा-हां गांव बेच डालूंगी।


मोटेराम-राम-राम। यह क्या कहती हो ? भूमि बिक गयी, तो फिर बात क्या रह जायेगी?


मोटेराम- भला, पृथ्वी हाथ से निकल गयी, तो तुम लोगों का जीवन निर्वाह कैसे होगा?


सुवामा-हमारा ईश्वर मालिक है। वही बेड़ा पार करेगा।


मोटेराम यह तो बड़े अफसोस की बात होगी कि ऐसे उपकारी पुरुष के लड़के-बाले दु:ख भोगें।


सुवामा-ईश्वर की यही इच्छा है, तो किसी का क्या बस?


मोटेराम-भला, मैं एक युक्ति बता दूं कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।


सुवामा- हां, बतलाइए बड़ा उपकार होगा।


मोटेराम-पहले तो एक दरख्वास्त लिखवाकर कलक्टर साहिब को दे दो कि मालगुलारी माफ की जाये। बाकी रुपये का बन्दोबस्त हमारे ऊपर छोड दो। हम जो चाहेंगे करेंगे, परन्तु इलाके पर आंच ना आने पायेगी।


सुवामा-कुछ प्रकट भी तो हो, आप इतने रुपये कहां से लायेंगी?


मोटेराम- तुम्हारे लिए रुपये की क्या कमी है? मुंशी जी के नाम पर बिना लिखा-पढ़ी के पचास हजार रुपये का बन्दोस्त हो जाना कोई बड़ी बात नहीं है। सच तो यह है कि रुपया रखा हुआ है, तुम्हारे मुंह से ‘हां’ निकलने की देरी है।


सुवामा- नगर के भद्र-पुरुषों ने एकत्र किया होगा?


मोटेराम- हां, बात-की-बात में रुपया एकत्र हो गया। साहब का इशारा बहुत था।


सुवामा-कर-मुक्ति के लिए प्रार्थना-पञ मुझसे न लिखवाया जाएगा और मैं अपने स्वामी के नाम ऋण ही लेना चाहती हूं। मैं सबका एक-एक पैसा अपने गांवों ही से चुका दूंगी।


यह कहकर सुवामा ने रुखाई से मुंह फेर लिया और उसके पीले तथा शोकान्वित बदन पर क्रोध-सा झलकने लगा। मोटेराम ने देखा कि बात बिगड़ना चाहती है, तो संभलकर बोले- अच्छा, जैसे तुम्हारी इच्छा। इसमें कोई जबरदस्ती नहीं है। मगर यदि हमने तुमको किसी प्रकार का दु:ख उठाते देखा, तो उस दिन प्रलय हो जायेगा। बस, इतना समझ लो।


सुवामा-तो आप क्या यह चाहते हैं कि मैं अपने पति के नाम पर दूसरों की कृतज्ञता का भार रखूं? मैं इसी घर में जल मरुंगी, अनशन करते-करते मर जाऊंगी, पर किसी की उपकृत न बनूंगी।


मोटेराम-छि:छि:। तुम्हारे ऊपर निहोरा कौन कर सकता है? कैसी बात मुख से निकालती है?ऋण लेने में कोई लाज नहीं है। कौन रईस है जिस पर लाख दो-लाख का ऋण न हो?


सुवामा- मुझे विश्वास नहीं होता कि इस ऋण में निहोरा है।


मोटेराम- सुवामा, तुम्हारी बुद्वि कहां गयी? भला, सब प्रकार के दु:ख उठा लोगी पर क्या तुम्हें इस बालक पर दया नहीं आती?


मोटेराम की यह चोट बहुत कड़ी लगी। सुवामा सजलनयना हो गई। उसने पुत्र की ओर करुणा-भरी दृष्टि से देखा। इस बच्चे के लिए मैंने कौन-कौन सी तपस्या नहीं की? क्या उसके भाग्य में दु:ख ही बदा है। जो अमोला जलवायु के प्रखर झोंकों से बचाता जाता था, जिस पर सूर्य की प्रचण्ड किरणें न पड़ने पाती थीं, जो स्नेह-सुधा से अभी सिंचित रहता था, क्या वह आज इस जलती हुई धूप और इस आग की लपट में मुरझायेगा? सुवामा कई मिनट तक इसी चिन्ता में बैठी रही। मोटेराम मन-ही-मन प्रसन्न हो रहे थे कि अब सफलीभूत हुआ। इतने में सुवामा ने सिर उठाकर कहा-जिसके पिता ने लाखों को जिलाया-खिलाया, वह दूसरों का आश्रित नहीं बन सकता। यदि पिता का धर्म उसका सहायक होगा, तो स्वयं दस को खिलाकर खायेगा। लड़के को बुलाते हुए ‘बेटा। तनिक यहां आओ। कल से तुम्हारी मिठाई, दूध, घी सब बन्द हो जायेंगे। रोओगे तो नहीं?’ यह कहकर उसने बेटे को प्यार से बैठा लिया और उसके गुलाबी गालों का पसीना पोंछकर चुम्बन कर लिया।


प्रताप- क्या कहा? कल से मिठाई बन्द होगी? क्यों क्या हलवाई की दुकान पर मिठाई नहीं है?


सुवामा-मिठाई तो है, पर उसका रुपया कौन देगा?


प्रताप- हम बड़े होंगे, तो उसको बहुत-सा रुपया देंगे। चल, टख। टख। देख मां, कैसा तेज घोड़ा है।


सुवामा की आंखों में फिर जल भर आया। ‘हा हन्त। इस सौन्दर्य और सुकुमारता की मूर्ति पर अभी से दरिद्रता की आपत्तियां आ जायेंगी। नहीं नहीं, मैं स्वयं सब भोग लूंगी। परन्तु अपने प्राण-प्यारे बच्चे के ऊपर आपत्ति की परछाहीं तक न आने दूंगी।’ माता तो यह सोच रही थी और प्रताप अपने हठी और मुंहजोर घोड़े पर चढ़ने में पूर्ण  शक्ति से लीन हो रहा था। बच्चे मन के राजा होते हैं।


अभिप्राय यह कि मोटेराम ने बहुत जाल फैलाया। विविध प्रकार का वाक्चातुर्य दिखलाया,परन्तु सुवामा ने एक बार ‘नहीं करके ‘हां’ न की। उसकी इस आत्मरक्षा का समाचार जिसने सुना, धन्य-धन्य कहा। लोगों के मन में उसकी प्रतिष्टा दूनी हो गयी। उसने वही किया, जो ऐसे संतोषपूर्ण और उदार-हृदय मनुष्य की स्त्री को करना उचित था।


इसके पन्द्रहवें दिन इलाका नीलामा पर चढ़ा। पचास सहस्र रुपये प्राप्त हुए कुल ऋण चुका दिया गया। घर का अनावश्यक सामान बेच दिया गया। मकान में भी सुवामा ने भीतर से ऊंची-ऊंची दीवारें खिंचवा कर दो अलग-अलग खण्ड कर दिये। एक में आप रहने लगी और दूसरा भाड़े पर उठा दिया।


                                                                                                                                      मुंशी प्रेमचन्द 

3:19 AM


सहकर्मी के परिवार से भी मेलजोल बढाये
एक सर्वेक्षण के दौरान जब पूछा गया कि क्या आप अपने कर्मचारियों के परिवार वालो, माता पिता या भतीजी-भांजियों की यहां तो बात ही नहीं है, उनकी पत्नी और उनके बच्चो के बारे में कुछ जानते है,यानि उनसे परिचय है, तो प्रत्येक १०० वरिष्ठ प्रबंधकों में से ९८ ने 'नही' में जवाब दिया|
यूरोप और अमेरिका में लगभग हर कंपनी इस सिलसिले में सर्वे करती है| किसी भी कंपनी में मोटे सर्वेक्षण से यह बात सामने आई है कि साल में शायद ही कभी कोई कर्मचारी अपने सहकर्मी के घर एक बार खाने-पीने के लिए गया हो|
लेकिन मनोवैज्ञानिको का कहना है है कि अपने सहकर्मी के परिवार के सदस्यों के साथ भी डिनर के दौरान थोड़ा भी समय गुजरने से, कार्यस्थल पर कामकाज के समय उस सहकर्मी के व्यवहार को समझने में काफी मदद मिलती है | जब एक   कर्मचारी अपने मैनेजर  से आकर कहता है कि उसकी बीवी या बच्चे कि तबियत  ठीक नही है या उनके साथ एक हादसा हो गया है , तो मैनेजर की आँखों के सामने पूरा दृश्य  घूमने लगता है और वह जो निर्णय लेता है, वह सद्भावनापूर्ण और व्यावहारिक होता है|
इसका मतलब यह भी नही कि एक ही ऑफिस के कर्मचारी से हर सप्ताह या माह में मिलें| गेट-टूगेदर,पिकनिक या मौज-मस्ती भरे डिनर पर ६ माह में एक बार चुनिन्दा ही सही कर्मचारियों कि मुलाकात एक-दुसरे को समझने में काफी दूर तक सहायक साबित होती है |
फंडा यह है कि अपने महत्वपूर्ण कर्मचारियों के परिवार से जब-तब नियमित रूप से मिलने का मौका निकाले | यह कार्यस्थल पर कामकाजी माहौल को काफी अनुकूल बना सकता है |

सफलता के तरीके

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